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मकर संक्रांति पर बिहार में सियासी चूल्हे गर्म, दही-चूड़ा भोज बना शक्ति प्रदर्शन का मंच

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पटना।बिहार में मकर संक्रांति अब सिर्फ पर्व नहीं, बल्कि सियासी संकेतों और समीकरणों का अहम दिन बन चुका है। हर साल की तरह इस बार भी दही-चूड़ा भोज के बहाने राजनीति के कई रंग एक साथ देखने को मिल रहे हैं। सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक, सभी दल इस पारंपरिक भोज को अपने-अपने तरीके से राजनीतिक संदेश देने के मंच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
एक ओर जेडीयू के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री रत्नेश सदा के आवास पर आयोजित दही-चूड़ा भोज में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, दोनों उपमुख्यमंत्री समेत एनडीए के कई बड़े नेता और मंत्री जुटे। यह आयोजन एनडीए की एकजुटता और शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है।
वहीं दूसरी ओर भाजपा कार्यालय में भी दही-चूड़ा भोज का आयोजन हुआ, जहां पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की खासी भीड़ देखने को मिली। इस आयोजन ने साफ कर दिया कि एनडीए के घटक दल इस पर्व के जरिए संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक संदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते।
इसी बीच सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा तेज प्रताप यादव के दही-चूड़ा भोज को लेकर रही। तेज प्रताप यादव द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में खुद आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की मौजूदगी ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया। लालू प्रसाद का पहुंचना यह संकेत देता है कि पारिवारिक और राजनीतिक रिश्तों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश जारी है।
हालांकि, इस आयोजन से तेजस्वी यादव की दूरी भी सियासी संदेशों को जन्म दे रही है। तेज प्रताप यादव ने स्वयं राबड़ी आवास जाकर लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को आमंत्रित किया था। लालू प्रसाद तो कार्यक्रम में शामिल हुए, लेकिन तेजस्वी यादव का न पहुंचना राजनीतिक विश्लेषण को और गहरा कर रहा है।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तेज प्रताप यादव के भोज में शामिल हो सकते हैं। वहीं राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने तेज प्रताप के आयोजन में पहुंचकर दही-चूड़ा का स्वाद लिया। उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे तेज प्रताप यादव के भोज में शामिल होंगे।
बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति को यूं ही ‘सियासी संक्रांति’ नहीं कहा जाता। अतीत में कई बार इसी पर्व के आसपास गठबंधन बने और बिगड़े हैं। दही-चूड़ा भोज के जरिए दिए जाने वाले संकेतों के मायने अक्सर समय के साथ सामने आते हैं।
फिलहाल, पटना से लेकर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों तक यही चर्चा है कि इस बार की सियासी खिचड़ी किस दिशा में पक रही है और इसके असर आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति को किस मोड़ पर ले जाएंगे।

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